Puja Aarti Rules: हिंदू धर्म में पूजा पाठ का अपना एक विशेष महत्व है। विधि विधान से भगवान की पूजा अर्चना से व्यक्ति के मन को शांति मिलती है और व्यक्ति के स्वभाव में सरलता आती है। भगवान की पूजा अर्चना के समय कई तरह की परम्पराएं भी निभाई जाती हैं। जैसे मंदिर मे प्रवेश करते समय मंदिर की सीढ़ियों को छूने की परंपरा। इन सभी परंपराओं को निभाने का कोई ना कोई विशेष कारण जरूर होता है। सनातन धर्म में पूजा पाठ से जुड़ी परंपराओं में से एक महत्वपूर्ण परंपरा आरती की थाली में रुपये रखना भी है। अक्सर आपने देखा होगा कि जब भी भक्त आरती लेते हैं तो उस समय अपनी श्रद्धानुसार कुछ रुपये आरती की थाली में रखते हैं। इसी तरह मंदिर में दर्शन करते वक्त भी भक्त दान पेटी में रुपये डालते हैं। लेकिन, क्या आपने सोचा है कि पूजा पाठ या आरती के वक्त पैसे डालने का महत्व क्या है। आइये इस लेख में जानते हैं।
पूजा की थाली में रुपये रखने के कारण
पंडित इंद्रमणि घनस्याल बताते हैं कि हिंदू धर्म में दान को सर्वोपरि माना गया है। श्रीमद्भागवत गीता के श्लोक “शदातव्यमिति यद्दानं दीयतेऽनुपकारिणे। देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृतम्।” में बताया गया है दान देना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान पुण्य करते रहना चाहिए। दान के योग्य व्यक्ति को ही दान किया जाना चाहिए। दान लेने वाले व्यक्ति से दान के बदले में कुछ भी वापस नहीं लेना चाहिए और अन्य व्यक्तियों के सामने खुद के द्वारा किये गए दान का गुणगान भी नहीं करना चाहिए। इस प्रकार दान करने से दान का पुण्य फल प्राप्त होता है। गीता में बताए गए श्लोक के अनुसार, मंदिर में रहने वाला पुजारी दान पाने के योग्य होता है। मंदिर में रहने वाले पुजारी भगवान की सेवा में लगे रहते हैं और मंदिर में आने वाले सभी भक्तों के जीवन की मंगलकामना की प्रार्थना करते हैं।
पूजा की थाली में रुपये रखने का महत्व
पौराणिक काल में ब्रह्मणों को मंदिर की साफ सफाई, रख रखाव और पूजा पाठ का कार्य सौंपा गया था। इसके बाद मंदिर में आने वाले भक्तों ने उनके जीवनयापन करने के लिए कुछ दान करने की परंपरा शुरू की। जिसके बाद से ही मंदिर की दान पेटी में अपनी श्रद्धा के अनुसार दान किया जाने लगा। दान राशि और वस्तुओं से पंडित के परिवार का भरण पोषण भी अच्छे से हो सके। मंदिर में आने वाले दान से ही मंदिर के बाकि कार्यों की व्यवस्था भी की जाती थी। मंदिर में आने वाले दान का कुछ हिस्सा गौ माता की सेवा के लिए गौशाला में भी दान किया जाता था। दान करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और उसे बैकुंठ में स्थान प्राप्त होता है। मंदिर में या जरूरतमंदों को अपनी क्षमता के अनुसार दान पुण्य करते रहना चाहिए।